उत्तर प्रदेश, अयोध्या में just rights for children संस्था के सहयोग से एक मां ने रोका नाबालिग बेटी का विवाह,
यूपी के अयोध्या के एक गांव में एक महिला सुनीता देवी (बदला हुआ नाम) अकेली रहने वाली अधेड़ उम्र की महिला हैं। उनके पति और बेटी उसी गांव में रहते हैं, लेकिन वह जानबूझकर उनसे दूरी बनाए रखती हैं। वर्षों पहले सुनीता ने वह घर छोड़ दिया था, क्योंकि उनके पति शराब के नशे में अक्सर उनके साथ मारपीट किया करते थे। अलग रहने के बावजूद मां का दिल कहां मानता है वह अपनी बेटी से दूर रहकर भी उसकी खोज-खबर लेती रहती थीं।
इसी दौरान एक दिन उन्हें यह चौंकाने वाली खबर मिली कि उसके शराबी पति ने 14 वर्षीय मंजू (बदला हुआ नाम) की शादी एक उम्रदराज व्यक्ति से तय कर दी है। यह सुनते ही वह अंदर तक हिल गईं। बीते समय की हिंसा और डर की यादें मन में तेजी से उभर आईं। उन्होंने सोचा कि उनकी बेटी अभी बहुत छोटी है, उसे दर्द और मजबूरियों से भरी जिंदगी की ओर नहीं धकेला जा सकता। उसी पल उन्होंने ठान लिया कि बेटी को बचाने और उसका बाल विवाह रोकने के लिए कुछ करना ही होगा।
सुनीता पहले अपराजिता सामाजिक समिति के बाल विवाह जागरूकता शिविरों में शामिल हो चुकी थीं, इसलिए उनके पास समिति के एक समन्वयक का नंबर था। उन्होंने बिना समय गंवाए फोन किया और मदद की गुहार लगाई। उनके लिए सबसे अहम बात यह थी कि उनकी पहचान उजागर न हो। इसलिए समिति ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित और गोपनीय रखी जाएगी। अपराजिता सामाजिक समिति बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कार्यरत देश के सबसे बड़े नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की सहयोगी संस्था है। जस्ट राइट्स फार चिल्ड्रेन अपने 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देशभर में बच्चों के लिए जमीन पर कार्य कर रहा है।
इसी संगठित नेटवर्क और जमीनी स्तर पर सक्रिय सहयोग का प्रभाव मंजू के मामले में भी साफ दिखाई देता है। अपराजिता सामाजिक समिति की निदेशक किरण बैस बताती हैं, “हमारी प्राथमिकता समय पर हस्तक्षेप करके मंजू को बचाना था और हमने तुरंत कार्रवाई की।” संगठन ने तुरंत जिला प्रशासन, बाल कल्याण समिति और पुलिस को सूचना दी। एक संयुक्त टीम मंजू के घर पहुंची और उसके पिता को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन ले गई। जहां उन्हें बाल विवाह के कानूनी परिणामों के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया गया। इसके बाद उन्होंने शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए कहा कि बेटी की शादी अब 18 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद ही करेंगे।
वहीं मंजू को बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया गया काउंसलिंग के दौरान, मंजू ने साफ-साफ कहा कि वह अपने पिता के घर वापस नहीं जाना चाहती। वह अपनी बड़ी बहन के साथ रहना चाहती है, जिसकी शादी हो चुकी है। उसे डर था कि अगर वह वापस गई, तो पिता फिर से शादी के लिए मजबूर करेंगे।
मंजू की यह कहानी सिर्फ एक बाल विवाह को रुकवाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जागरूकता अभियानों का समाज पर कितना गहरा, दूरगामी और स्थाई असर होता है। जब जानकारी डर पर भारी पड़ती है और समझ परंपराओं को चुनौती देती है, तब बदलाव की जमीन तैयार होती है। रूढ़ियों की जड़ें भले ही गहरी हों, लेकिन उन्हें तोड़ने का सबसे सशक्त और कारगर हथियार जागरूकता ही है। मंजू का बचाया जाना इसी बदलती सोच की मजबूत मिसाल है। आज वह सुरक्षित है और अपनी बहन के घर रह रही है। संगठन के सदस्य लगातार उसके संपर्क में हैं, उसकी सुरक्षा पर नजर रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि भविष्य में ऐसा कोई खतरा दोबारा न पैदा हो। वहीं सुनीता देवी अब भी अलग रहकर जीवन बिता रही हैं, लेकिन मन में गहरी राहत और संतोष के साथ।








