बालकों को गुलामी और अमानवीय परिस्थितियों से बचाता है शोषण के विरुद्ध अधिकार:अमित मिश्रा

कौशाम्बी: बालकों को गुलामी और अमानवीय परिस्थितियों से बचाता है शोषण के विरुद्ध अधिकार:अमित मिश्रा,

यूपी के कौशाम्बी में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जनपद न्यायालय कौशाम्बी के तत्वावधान में महंगांव इंटर कॉलेज महंगांव चायल कौशाम्बी में शोषण के विरुद्ध अधिकार, पॉश एक्ट व बाल अधिकार विषय पर विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।

शिविर में बाल अधिकारों पर बात करते हुए डॉ. नरेन्द्र दिवाकर ने कहा कि आज बच्चों का जीवन पहले से कहीं अधिक हिंसा, संघर्ष और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से प्रभावित हो रहा है। बालक मानव समाज के सबसे छोटे सदस्य हैं और किसी भी देश के भविष्य हैं। बाल अधिकार प्रत्येक बच्चे (बालक एवं बालिका दोनों) को, चाहे उनकी आयु, जाति, धर्म, लिंग, आर्थिक स्थिति या जन्मस्थान कुछ भी हो, अधिकार प्राप्त हैं।

बाल अधिकार किसी भी बालक के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बाल अधिकार को मुख्यतया 4 अधिकारों यथा जीने का अधिकार, संरक्षण का अधिकार, विकास का अधिकार और सहभागिता का अधिकार, में बांटकर देखा जा सकता है। ये अधिकार बच्चों को गरिमा और समान अवसरों के साथ विकसित होने का अधिकारी बनाता है साथ ही उन्हें किसी भी प्रकार शोषण और उपेक्षा से भी बचाता है। बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं इसलिए उन्हें विशेष संरक्षण और सहायता का अधिकार है। भारतीय संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं जो जिनके बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

अधिवक्ता संदीप द्विवेदी ने कहा कि शोषण के विरुद्ध अधिकार से जुड़े प्रावधान भारतीय संविधान सहित कई कानूनों में दिए गए हैं। जिनमें बालकों के लिए मित्रतापूर्ण वातावरण बनाए रखने की व्यवस्था है। बच्चों के अधिकारों के हनन को रोकने के लिए भारतीय संविधान के अनु. 23 और 24 शोषण के विरूद्ध अधिकारों का प्रावधान है। बाल मजदूरी अधिनियम 1986, पॉक्सो एक्ट 2012, कारखाना अधिनियम 1948 आदि सभी बालकों के अधिकारों के संरक्षण की बात करते हैं।

तहसील विधिक सहायता क्लीनिक के अध्यक्ष व तहसीलदार चायल ने कहा कि बालक बहुत संवेदनशील होते हैं इसलिए हमें उनसे मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए और उन्हें मारना, चिढ़ाना, मजदूरी करवाना, उन्हें खतरनाक कामों में लगाना, डराना-धमकाना या उनका उत्पीड़न करना अपराध की श्रेणी में आते हैं। बाल अधिकारों के हनन और बालकों के शोषण रोकने के लिए अभिभावक, शिक्षक और सामान्य जन का जागरूक होना बहुत जरूरी है। तहसील स्तर की किसी भी समस्या के लिए तहसील विधिक सहायता क्लीनिक में कार्यरत अधिकार मित्र और हमसे संपर्क कर सकते हैं।

चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल अमित कुमार मिश्र ने कहा कि महिलाओं और बालकों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए ही सरकारें कानून बनाती हैं। उनकी सार्थकता तभी होगी जब इन कानूनों के बारे में जागरूकता होगी।जब बच्चे और महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे तो कोई भी उनका शोषण नहीं कर सकेगा। भारतीय संविधान सहित तमाम कानूनों में उल्लिखित शोषण के विरुद्ध अधिकार किसी भी व्यक्ति (विशेष तौर से कमजोर वर्ग के लोगों को और बालकों को भी) गुलामी और अमानवीय परिस्थितियों से बचाते हैं।

पॉश एक्ट आर्थत कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 में महिलाओं को उत्पीड़न और कार्यस्थल पर सकारात्मक माहौल बनाने हेतु आंतरिक और परिवाद समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत यदि आरोपी के खिलाफ शिकायत प्रक्रियाधीन है तो पीड़ित को अवकाश लेने का अधिकार है जो अवकाश अन्य सभी अवकाशों के अतिरिक्त होगी।पॉश एक्ट भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 19 के अनुरूप महिलाओं को कार्य स्थल पर संसद की विधायी अभिव्यक्ति है जिसने महिला कार्यकर्ताओं को सुरक्षित माहौल में काम करने के लिए वातावरण प्रदान किया।कार्यक्रम में बाल विवाह मुक्त भारत अभियान हेतु शपथ भी दिलाई गई।

शिविर में अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद ज्ञापन प्रधानाचार्य मो. नसीम खां ने किया। इस अवसर पर शिक्षक-शिक्षिकाओं सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

 

Ashok Kesarwani- Editor
Author: Ashok Kesarwani- Editor