गरिमापूर्ण जीवन,समानता के नैसर्गिक और मौलिक अधिकारों का सबसे क्रूर हनन है एसिड अटैक- डॉ. दिवाकर

कौशाम्बी: गरिमापूर्ण जीवन,समानता के नैसर्गिक और मौलिक अधिकारों का सबसे क्रूर हनन है एसिड अटैक- डॉ. दिवाकर,

यूपी के कौशाम्बी जिले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र चायल में एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकार व हक और पॉश एक्ट विषय पर विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।

एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकार विषय पर बात रखते हुए डॉ. नरेन्द्र दिवाकर ने कहा कि किसी व्यक्ति पर एसिड अटैक जिसे सामान्य भाषा में तेज़ाब से हमला कहा जाता है, या किसी अन्य इसी तरह के ज्वलनशील पदार्थ का उपयोग करके जानबूझकर हमला करना, उसके शारिरिक अंगों को विकृत करना, यातना देना या जान से मारना है। ऐसे हमले से स्थायी शारीरिक विकृति, आंतरिक अंगों को क्षति और कई मामलों में मृत्यु तक भी हो जाती है। इस हमले के पीड़ितों को जीवन भर कई संघर्षों व परेशानियों का सामना करना पड़ता है, साथ ही उन्हें पूर्ण विकलांगता और गंभीर अवसाद का सामना भी करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि इस तरह का हमला न केवल एक जघन्य अपराध है, बल्कि यह व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन, शारीरिक अखंडता और समानता के नैसर्गिक और मौलिक अधिकारों का सबसे क्रूर हनन है। यह इंसान को जीवनभर शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पीड़ा के गहरे अंधेरे में धकेल देता है।

उन्होंने बताया कि देश में एसिड अटैक (तेजाब हमला) पीड़ितों को कानून के तहत न्याय, सरकारी और निजी अस्पतालों में निःशुल्क चिकित्सा, इलाज से मना करने पर अस्पतालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, पीड़ित का पुनर्वास, कौशल प्रशिक्षण और न्यूनतम 3 लाख रुपए तक (1लाख 15 दिन के भीतर तथा 2 लाख 2 माह के भीतर, प्रधानमंत्री राहत कोष से 1 लाख अतिरिक्त) वित्तीय सहायता प्राप्त करने आदि के महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं।

चिकित्सा और उपचार, मुआवजा या वित्तीय सहायता, विकलांग व्यक्तियों का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विकलांगता लाभ यथा प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवास, आयुष्मान भारत/प्रधानमंत्री जान आरोग्य योजना/मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना, उत्तर प्रदेश राज्य में इस हेतु उपलब्ध पीड़ित मुआवजा योजनाओं, वित्तीय सहायता प्राप्त करने हेतु कानूनी प्रक्रियाओं, वित्तीय सहायता प्राप्त करने हेतु आवेदन में लगने वाले दस्तावेजों, पीड़ित की मदद हेतु महिला एवं कल्याण विभाग तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास प्रदान करने में अग्रणी भूमिका आदि के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान की गई।

उन्होंने बताया कि पॉश एक्ट अर्थात कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013) के बारे में बताते हुए कहा कि यह कानून कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाने और सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है। साथ ही सभी सार्वजनिक, निजी क्षेत्रों, कॉर्पोरेट कार्यालयों, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, असंगठित क्षेत्रों और घरेलू कामगारों पर समान रूप से लागू होता है।आंतरिक शिकायत समिति, स्थानीय शिकायत समिति और शी बॉक्स पोर्टल के बारे में भी जानकारी प्रदान की गई। पीड़ित महिला घटना घटित होने के 3 महीने के भीतर लिखित रूप में शिकायत दर्ज करा सकती ती है। समिति को भी अपनी जांच 90 दिनों के भीतर पूरी करनी होती है।

पीएलवी ममता दिवाकर ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं और सहूलियतों तथा राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा संचालित योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान किया।

शिविर में खण्ड विकास चायल से ग्राम विकास अधिकारी स्वागत अग्रहरी और सखी वन स्टॉप सेंटर से राजकरन ने भी प्रतिभाग किया और विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के बारे में बताया।

इस अवसर पर मरीज व उनके परिजन, स्वास्थ्य केन्द्र के कर्मचारी और अधिकारी भी उपस्थित रहे।

Ashok Kesarwani- Editor
Author: Ashok Kesarwani- Editor