कौशाम्बी: संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न विद्यालयों के प्रवक्ताओं को किया गया प्रशिक्षित,संविधान के मूल्यों, मौलिक अधिकारों एवं नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर दिया गया जोर,
यूपी के कौशाम्बी जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) मंझनपुर में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जनपद कौशाम्बी के तत्वावधान में ‘संविधान संवाद’ विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रवक्ताओं को भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों, संवैधानिक मूल्यों, मौलिक अधिकारों एवं कर्तव्यों तथा विधिक जागरूकता के महत्व से अवगत कराना रहा, जिससे वे विद्यार्थियों एवं समाज के अन्य वर्गों तक संवैधानिक जानकारी प्रभावी ढंग से पहुँचा सकें।
उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम में अपर जनपद न्यायाधीश चतुर्थ प्रकाश चंद्र शुक्ला, अपर जनपद न्यायाधीश पंचम अशोक कुमार यादव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव प्रिया सिंह एवं चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल अमित मिश्रा द्वारा उपस्थित प्रवक्ताओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
प्रशिक्षण के दौरान एडीजे- चतुर्थ प्रकाश चंद्र शुक्ला ने अपनी बात रखते हुए कहा कि भारतीय संविधान की महत्ता, संवैधानिक अधिकारों एवं कर्तव्यों, विधि के शासन, समानता के सिद्धांत तथा न्याय तक समान पहुँच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जानकारी प्रदान की। साथ ही, समाज में विधिक जागरूकता के प्रसार और संवैधानिक आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने में शिक्षकों एवं प्रवक्ताओं की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।
एडीजे- पंचम अशोक कुमार यादव ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अधिकार प्रदान करने के साथ-साथ राष्ट्र एवं समाज के प्रति कर्तव्यों का बोध भी कराता है। संवैधानिक मूल्यों की समझ विकसित करने तथा नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने में शैक्षणिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेष तौर पर संविधान के बारे में 9 से 12 वीं कक्षा के छात्रों को ज्यादा जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि जब वह जागरूक होंगे तो समाज को और बेहतर दिशा देने का काम करेंगे। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से संविधान के प्रति सम्मान, विधिक साक्षरता एवं न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के उद्देश्यों को साकार करने में सहायता मिलती है।
सचिव प्रिया सिंह ने कहा कि हम सभी यह जानते हैं कि भारत का संविधान, संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उनके विचारों ने भारतीय लोकतंत्र को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की मजबूत आधारशिला प्रदान की।
उन्होंने कहा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने तथा सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त किया गया है।संविधान की प्रस्तावना में निहित ये आदर्श केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की मूल भावना हैं।हमें यह समझना होगा कि संविधान तभी सफल होगा, जब उसके मूल्यों का पालन केवल न्यायालयों और सरकारी कार्यालयों तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन में भी दिखाई देगा।साथ ही मौलिक अधिकार एवं नागरिकों की गरिमा भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का प्रावधान है।इन अधिकारों में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।इन प्रावधानों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर अनुचित भेदभाव न हो और एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के साथ समान व्यवहार करके, एक अधिकारी निष्पक्षता से कार्य करके, एक नागरिक कानून का पालन करके और एक सामाजिक कार्यकर्ता जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करके संविधान के मूल्यों को मजबूत कर सकता है।
चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल अमित मिश्रा ने कहा कि न्याय केवल न्यायालय में मुकदमा लड़ने का नाम नहीं है। वास्तविक न्याय तब है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों को जानता हो, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा सके और आवश्यकता पड़ने पर उसे समय पर विधिक सहायता उपलब्ध हो।इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत विधिक सेवाओं की व्यवस्था की गई है।
उन्होंने बताया कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराना, विधिक जागरूकता फैलाना तथा लोक अदालतों और अन्य उपयुक्त माध्यमों से विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करना है।समाज के गरीब, वंचित, महिलाएँ, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन तथा अन्य पात्र वर्गों के लोगों को उनके कानूनी अधिकारों की जानकारी देना अत्यंत आवश्यक है।अनेक बार जानकारी के अभाव में व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित रह जाता है। कई लोग यह नहीं जानते कि उन्हें निःशुल्क विधिक सहायता मिल सकती है या वे अपनी समस्या के समाधान के लिए कहाँ संपर्क करें।ऐसी स्थिति में विधिक जागरूकता शिविरों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।न्याय का वास्तविक अर्थ केवल न्याय देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि न्याय प्रत्येक जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुँचे।
साथ ही पॉक्सो अधिनियम पर बात करते हुए कहा कि विद्यालय और शैक्षणिक संस्थान बच्चों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान हैं। शिक्षकों और विद्यालय कर्मचारियों को बच्चों के व्यवहार, भय, असामान्य चुप्पी, अचानक बदलाव या किसी संकेत को संवेदनशीलता से समझने का प्रयास करना चाहिए।यदि कोई बच्चा किसी अनुचित स्पर्श, व्यवहार या घटना के बारे में बताता है, तो उसकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। उसे डाँटना, दोष देना, धमकाना या घटना को छिपाने के लिए कहना बिल्कुल उचित नहीं है।विद्यालयों में बाल सुरक्षा नीति, शिकायत व्यवस्था और जागरूकता कार्यक्रम प्रभावी रूप से लागू किए जाने चाहिए। बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, व्यक्तिगत सीमाओं, ऑनलाइन सुरक्षा तथा सहायता प्राप्त करने के तरीकों के बारे में आयु-उपयुक्त जानकारी दी जानी चाहिए।शिक्षकों को स्वयं बच्चे से विस्तृत पूछताछ करने के बजाय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार संबंधित अधिकारियों को सूचना देनी चाहिए।एक संवेदनशील शिक्षक बच्चे के जीवन में सुरक्षा, विश्वास और आशा का महत्वपूर्ण आधार बन सकता। पॉक्सो अधिनियम के मामलों में बच्चे को केवल कानूनी सहायता ही नहीं, बल्कि चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है।बच्चे की चिकित्सकीय जाँच संवेदनशील तरीके से और आवश्यक सहमति तथा कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए की जानी चाहिए। बच्चे को सुरक्षित आश्रय, परामर्श, शिक्षा और पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।जिला विधिक सेवा प्राधिकरण बच्चे और उसके परिवार को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करा सकता है। पीड़ित मुआवजा योजना के अंतर्गत पात्र बच्चे को आर्थिक सहायता भी मिल सकती है।बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, विद्यालय और विधिक सेवा संस्थाएँ मिलकर बच्चे के संरक्षण और पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।बच्चे को न्याय तभी मिलेगा, जब उसकी सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की भी रक्षा की जाए।
कार्यक्रम का संचालन शिक्षक चंद्रभूषण पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापन पीएलवी अमरदीप दिवाकर ने किया।इस कार्यक्रम में कौशाम्बी जनपद के विभिन्न विद्यालयों के सैकड़ों प्रवक्ता एवं डायट प्रवक्ता भी उपस्थित रहे।








