पत्रकारिता कभी एक मुकद्दस किताब थी:पढ़ने लगे लोग उपन्यासों की तरह

राष्ट्रीय: भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे,पत्रकारिता कभी एक मुकद्दस किताब थी, पढ़ने लगे लोग उपन्यासों की तरह:दिलीप श्रीवास्तव,

पत्रकारिता एक ऐसी विधा है,जो जनसाधारण व सरकार के बीच बेहतर समंजस ही नही करती बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा के बचाव का सबसे बड़ा माध्यम भी है।

जहां तक भारतीय हिन्दी पत्रकारिता का सवाल है, तो पंडित युगल किशोर शुक्ला द्वारा 30 मई 1826 में ‘उदंड मार्तण्ड ,हिंदी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया गया था । जिसके कारण 30 मई को भारत में पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। जिसके गौरवशाली इतिहास के 200 वर्ष पूरे होने जा रहे। वही 1830 में राजा राममोहन राय ने बहुभाषी हिंदी साप्ताहिक वंगदूत का प्रकाशन किया था।

वर्तमान दौर की पत्रकारिता कि जिसके संबंध में काफी समय पूर्व”” साहित्यकार, पत्रकार अवधेश श्रीवास्तव ने किसी मंच से कहा था एक समय था जब अखबार में छपी खबर गीता, कुरान तथा बाइबिल की तरह पवित्र व प्रमाणित मानी जाती थी और आम जनता उसे साक्ष्य के रूप में विभिन्न स्थानों पर प्रस्तुत करती थी”। किंतु वर्तमान दौर में लोग यह कहने में कोई संकोच नहीं करते कि ” अखबार में कुछ भी छप जाता है, और कुछ भी छुपवा लो”।

90 के दशक में अखबारों में छपी खबरों पर लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा में गरमा-गरम बहस व चर्चाएं होती थी तथा विपक्ष उन खबरों के बारे में सत्तापक्ष से जवाब मांगता था। वह सब गुजरी हुई बात अब हो गई है अब तो अखबारों में मुद्दों को समस्याओं पर संपादकीय भी देखने को नहीं मिलती है, बल्कि संपादकी ए सरकार के गुणगान से भरी होती है।

वर्तमान पत्रकारिता के गिरते स्तर और विश्वसनीयता के संकट के लिए कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि मीडिया संस्थानों का व्यावसायिक हित, राजनीतिक दबाव, सोशल मीडिया की जल्दबाजी और दर्शकों की बदलती पसंद सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं, पत्रकारिता की साख गिरने के मुख्य कारण व्यावसायिकरण और टीआरपी की दौड़,समाचार व पत्रकारिता अब जनसेवा व मिशन न होकर एक ‘उत्पाद’ बन गए हैं। विज्ञापन के दबाव में गंभीर मुद्दों के बजाय सनसनीखेज खबरों को प्राथमिकता दी जाती है। मीडिया घरानों के अपने व्यावसायिक और राजनीतिक हित हैं। पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।सोशल मीडिया का प्रभाव-

फेसबुक, और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर ‘सबसे पहले’ खबर देने की होड़ में बिना पुष्टि के फर्जी खबरें प्रसारित हो जाती हैं।

पत्रकारों की नौकरी में असुरक्षा- अपवाद स्वरूप अगर कुछ संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो तमाम संस्थान अपने पत्रकार को वेतन एवं मानदेय तक नही देते। और न ही मीडिया संस्थान पत्रकार की योग्यता व शिक्षा पर ध्यान देते हैं बल्कि एजेंसी लो,विज्ञापन दो और पत्रकार बन जाओ की तर्ज पर कार्य करते । यही नही कई संस्थानों में पत्रकारों को पर्याप्त वेतन न मिलना और नौकरी की अनिश्चितता उन्हें दबाव में काम करने या समझौता करने के लिए मजबूर करती है। सनसनीखेज हेडलाइन डिजिटल मीडिया और यूट्यूब पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक हेडलाइंस का उपयोग किया जाता है, जो पाठकों को गुमराह करते हैं।इस गिरावट में मीडिया मालिकों, संपादकों, राजनीतिक दलों और कहीं न कहीं उन दर्शकों/पाठकों की भी जिम्मेदारी है जो गंभीर विश्लेषण के बजाय मसालेदार खबरें देखना पसंद करते।

Ashok Kesarwani- Editor
Author: Ashok Kesarwani- Editor