विदेशी आक्रांताओं के साथ आए लेखकों ने किया है श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर विध्वंस का उल्लेख: महेंद्र प्रताप

मथुरा: विदेशी आक्रांताओं के साथ आए लेखकों ने किया है श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर विध्वंस का उल्लेख: महेंद्र प्रताप,

यूपी के मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह प्रकरण में हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के विध्वंस का उल्लेख केवल हिंदू पक्ष के दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशी आक्रांताओं के साथ में आए उनके मंत्रियों (मुस्लिम इतिहासकारों) और तत्कालीन लेखकों ने भी अपनी पुस्तकों में इसका वर्णन किया है। उन्होंने कहा कि शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष को इन ऐतिहासिक स्रोतों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए और भगवान श्रीकृष्ण के मूल गर्भगृह स्थल पर अपने दावे से पीछे हटना चाहिए।

हिंदू महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि मुस्लिम इतिहासकार उत्बी (उत्लफी) की तारीख-ए-यामिनी, साकी मुस्तअिद खान की मआसिर-ए-आलमगीरी तथा औरंगजेबनामा सहित कई ऐतिहासिक ग्रंथों में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि इन ग्रंथों के लेखक तत्कालीन विदेशी आक्रांताओं के शासन से जुड़े रहे और उन्होंने अपने समय की घटनाओं का विवरण दर्ज किया। ऐसे में इन ऐतिहासिक उल्लेखों को केवल एक पक्ष का दावा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त एलेक्जेंडर कनिंघम की आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, एफ एस. ग्राउस की मथुरा: ए डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर तथा इलियट-डाउसन के ऐतिहासिक संकलनों में भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध हैं।

महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि यदि शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष स्वयं को औरंगजेब की नीतियों का समर्थक नहीं मानता, तो उसे इतिहास में दर्ज मंदिर विध्वंस की घटनाओं से उत्पन्न विवाद के समाधान की दिशा में सकारात्मक पहल करनी चाहिए।

उन्होंने वर्ष 1968 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और शाही ईदगाह इंतजामिया कमेटी के बीच हुए समझौते पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह समझौता गलत है और हमने इसको न्यायालय में चुनौती दी है। फर्जी तरीके से किए गए समझौते को शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष सही ठहराने की कोशिश कर है, जिसमें वह कभी सफल नहीं हो सकता। क्योंकि भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की है।उनका कहना है कि यदि मुस्लिम पक्ष के पास अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

Ashok Kesarwani- Editor
Author: Ashok Kesarwani- Editor